February 18, 2012

उदासी, बहुत सारी बेसबब उदासी...


कौन पुकारेगा और किसको पुकारेगा... कोई नहीं पुकारेगा, किसी को नहीं पुकारेगा, फिर भी दया करो मुझ पर..

कोई कविता कोई कहानी नहीं सूझती
बस तेरी आहट की लरज़िश मेरी छत पर उतर रही है.

ईंटों के घर की कच्ची छत पर
बिछे हुए इस सन्नाटे में यादों का चूरा उड़ता दिखता है.

इस चूरे में एक उजला उजला दिन निकला है
दिन की तपती पीठ पे इक सायकिल फिसली जाती है

सायकिल पर रखे बस्ते में इक गीला दरिया बैठा है

इस दरिया में यादों की रंगीन मछलियाँ
गोते दर गोता खाती कोई लाकेट ढूंढ रही है,
जो तूने आँखों से चूमा था...

इस मंज़र से घबरा कर दिल और भी डूबा, साँस गई
आखिर उकता कर मैंने
विस्की जिन जो भी रखी थी, सब पी डाली है
फिर भी बाहर सन्नाटा है, फिर भी भीतर सब खाली खाली है.

कोई कविता
कोई कहानी नहीं सूझती, बस तेरी आहट की लरज़िश...

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.