April 15, 2012

गठरी में भरी अकूत कल्पनाएँ...


कुछ बातें मिट्टी से इश्क़, वतन के ख़याल और ईश्वर के बारे में. वह ईश्वर, जो हमारी कैद आत्मा पर रखी हुई काली परछाई मात्र है. बाकी महबूब सबसे हसीन है, वह सदा कमसिन है. बाँहों से फिसलता हुआ, सताता जाता है. हम फिर लौट कर उसी महबूब की गोद में सर रख कर आँखें मूँद लेते हैं.. यानि सब कुछ बेतरतीब है, ओरण के किसी पेड़ की छाँव में अनगढ़ गीत गाते लड़के की तरह

गिरजे का ख़याल आते ही
देख पाता हूँ एक अटारी
और उसके अंदर बंधी हुई घंटी.

तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
तो बेहिसाब ख़यालों की पतंग उड़ती है
दूर दूर तक ईश्वर के खेतों में.
* * *

ईश्वर एक मूर्ख अध्यापक है
अपनी ही भूलों को दुरस्त करने के लिए
डूबा रहता है नरक और स्वर्ग के फरेब में.
* * *

रात की हर घड़ी
मेरे साथ सोये रहते हैं, ईमान और कुफ़्र
तुम्हारी याद आते ही
मैं ईमान को धकेल देना चाहता हूँ, पलंग से नीचे,

मुझे नफ़रत है भौतिक चीज़ों से भी
कि उस वक्त तारों को देखने वाली दूरबीन से
नहीं की जा सकती कल्पना, प्रेम के आकार की.
* * *

उन मुखौटों को
बाद हमारे भी किया जायेगा याद
जो मुरत्तिब को भूल सके.

जिन्होंने अपनी आत्मा से
पुकारा होगा,वतन की मिट्टी को.
[Murattib - arranger, disposer; director]
* * *
[Image courtesy : Lisa and The Devil]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.