December 14, 2012

वाह वाह गुज़रा फ़कीरां दा...

तुम ठीक हो, मैं खराब हूँ।
मगर गफूर ख़ान मांगणियार और जमील ख़ान की आवाज़ में कुछ सुनोगे?
कुछ सूफ़ी.... जैसा मुझ कमअक्ल को समझ आता है, वैसा अर्थ कर दिया है।

इस दुनिया ने दिखावे में दाढ़ी को सफ़ेद कर लिया है
और पराया माल खाने वालों को सब्जी भी मीठी लगती है।

न कभी मंदिर मस्जिद गया, न ही कभी कब्र का अंधेरा देखा,
बुल्ले शाह कहता है तुझे उस दिन मालूम होगा जब मुंह पर (कब्र की) मिट्टी गिरेगी।

ज्ञान की हजारों किताबें खूब पढ़ी, अपने आपको कभी पढ़ा ही नहीं।
दौड़ दौड़ के मंदिर और मस्जिद गया मगर ख़ुद के मन में घुस कर कभी देखा ही नहीं।

इस तरह लड़ता है शैतान से आदमी, यूं कभी खुद से तो लड़ा ही नहीं।
बुल्लेशाह कहता है आसमान कब पकड़ में आया है कि मन में बसे हुये को छूकर देखा ही नहीं किया।

प्रिय हो प्रिय का सम्मान भी हो, वहीं मित्रता निभाने का सुख भी हो
मित्रता निभाने वाली ऐसी जगहों पर ही पीर और फरीद बसते हैं।

वाह वाह हम फ़कीरों का ज़िंदगी को इस तरह बिताना
वाह वाह हम अमीरों का ज़िंदगी को इस तरह बिताना
कि हम कभी मांग मांग कर रोटियों के टुकड़े खाते हैं, कभी हम अमीरों का भोज करते हैं
कभी हम सर पर छोटी पगड़ी बांधते हैं, कंधे पर दुशाला ओढ़ कर निकलते हैं, कभी हम लीर लीर कपड़ों में भी रह लेते हैं

वाह वाह गुज़रा फ़कीरां दा...

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.