December 6, 2012

वो एक तस्वीर थी

एक श्वेत श्याम स्थिर छवि। 

वह गायक इसी लम्हे को जीने के लिए क़ैद कर लिया गया था। मगर वह जा चुका था। उसकी आवाज़ का कौमार्य शेष रह गया था। बार बार आलिंगन में बांध लेने और आवाज़ के होठों पर बोसे दिये जाने के लिए। आवाज़ की खनक से उदासी बुनने के हुनर के कारण कई लोगों ने खिड़की के बाहर देखते कितनी ही शामें बुझा दी होंगी। मुझे आवाज़ की भाषा की रेशमी तारबंदी के पार जाने का मन हुआ। ज़रूरी नहीं था कि पश्चिम के संगीत से ही बड़े खाली कमरों वाले घर की रात को भरा जा सकता हो, उदासी से। मैंने एक कमायचा के उस्ताद की छवि को उसी जगह रखा दिया। आवाज़ फिर भी वैसी ही थी। मन के गहरे से आती कोई पुकार। प्रेम करने का अनुरोध। कोई बिना ज़ुबान के बोलता हुआ कि आओ मेरे बदन को अपनी बाहों में भर लो। मुझे भिगो डालो। अजगर की तरह कस लो उस लम्हे तक के लिए जब तक कि भीतर की सारी हसरतों और दुखो का चूरा न हो जाए। 

वो श्वेत श्याम छवि एक मरे हुये आदमी की थी। वो आवाज़ नहीं थी, संगीत का एक टुकड़ा था, वह एक खूबसूरत दुख था, सफ़ेद काला रंग था। 

वो आवाज़ कुछ नहीं थी। एक नन्ही लड़की को चूम लेने या फिर उसे ऐसे ही जाने देने का प्रयोजन मात्र नहीं। यह उस लड़की के आने से पहले और जाने के बाद के रंग का चित्र भी नहीं। अपनी याद के रोज़नामचे के भीतर अटकी कोई तारीख भी नहीं। स्टुडियो के बाहर पेड़ों के साये बुन रहे लेंपपोस्ट की रोशनी के आस पास चक्कर काटते हुये सुने गए संगीत के दर्ज़ ब्योरों को फिर से मुड़ कर देख लेने की चाह भी नहीं। इसलिए कि मैं मर गया हूँ। जैसे आवाज़ की भाषा को न समझ कर कोई पतंगा रात की कुंडली की गंध के लोभ में मारा जाता हो। मैंने अपने परों को झाड़ लिया इसलिए नहीं कि एक बार और उड़ कर देखूँ, लेंपपोस्ट की रोशनी के आखिरी सिरे तक। यूं ही कि क्या करूँ? 

कमायचा गहरा था। उसकी ज़ुबान चुप हो गयी थी और अन्तर्मन से कोई हूक उठ रही थी। हॉस्टल के सीले कमरे में पड़े हुये ऐसे युद्धबंदी की आवाज़ थी जिसके पास वापसी का रास्ता खो गया हो। जिसने बदन की हरारत को तोड़ देने की अनेक कोशिशों के बाद कहा हो। आओ मुझे बाहों में भर लो। मुझे प्रेम करो। मुझे चूम लो। यह उसकी मुक्ति है। वस्तुतः यह शीशे के इस और उस पार वाला रंग है। पहली मंज़िल के किसी सस्ते बार में नाच रही नवयौवना या आधे भरे और खाली पड़े हुये पैमानों का प्रतिबिंब है। फुटपाथ पर पुरानी जींस और जोगर्स पहने बैठे हुये आधे बूढ़े आदमी के लिए प्रलोभन है। यह अंधेरे की मरीचिका है। यह गला रेतते हुये कसाई की ठंडी अंगुलियों को छूकर जाता हुआ गरम खून है। 

वो एक तस्वीर थी। जिससे एक ही आवाज़ आ रही थी, एक दिन तुम भी तस्वीर बन जाओगे। विस्मृति की बारिश में धुल जाने तक के लिए। 

मैंने अपनी कविताओं और कहानियों पर एक उदास नज़र डाली और उन लोगों को फिर से बहुत सारा प्यार किया जिनके लिए मैंने ये शब्द इकट्ठा किए थे। मैंने खाली पड़ी हुई बोतलों को देखा। करवट लिए पड़े हुये एक बाउल को देखा। मैंने पी जा चुकी शराब के बारे में सोचा। मैंने मटर के उन दानों को याद किया जो काले नमक से भरे हुये थे। मैंने बीते हुये लम्हों के लिए फिर से कोई धुन प्ले कर दी। रेगिस्तान की सर्द रात में बबूल के सफ़ेद लंबे कांटे जैसी धुन। 

श्वेत श्याम तस्वीर अब भी वैसी ही थी। मेरा इंतज़ार कर रही थी कि मैं कब मर कर ऐसा दिखने लगूँगा। मैं सोच रहा था कि ज़रूरी काम क्या है, जो इन जीने के दिनों में कर लिए जाएँ।



सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.