April 24, 2013

दुछत्ती से उलटा लटका मकड़ा


बेरी पर खिले हैं कच्चे हरे पत्ते और कोमल कांटे। तुम्हारे बदन के अनछुए कच्चे रंगों की नक़ल उतारी है कुदरत ने। वक़्त के सितम तक के लिए। इस सुबह की किनारी पर लिखे हुये हैं तुम्हारी आलस भरी अंगड़ाई से पहले के मेरे बोसे। बासी मुंह मगर दम-ताज़ा आत्मा की पक्की मुहर वाले। ऐसा क्यों है कि तुमने गिरा रखा है खिड़की पर पर्दा, मैं पलट रहा हूँ याद के एल्बम से कई तस्वीरें। सूने रास्ते, नए मकान, और शाम। 
मैं तुम्हारे इंतज़ार के धागे से बंधा हुआ इस वक़्त दुछत्ती से उलटा लटका हुआ मकड़ा हूँ। तुम अदृश्य हवा की तरह दे रही हो मेरी ज़िंदगी को झूला। मैं तुम्हें न पाकर घबरा जाता हूँ। जबकि सुबह के इस वक़्त मेरी माँ पौंछ रही है उदासी, पिता की याद की। मैं सोचता हूँ कि पिता हमेशा के लिए जाने की जगह यहीं रह कर माँ को रुलाते तो भी अच्छा था। जैसे तुम नए बहाने से रुलाते जाते हो हर दिन मगर तुम होते हो इसी बात से खुशी आ जाती है। 
मैं क्या करूँ कि गिर रहे हैं परिंदों के कोमल पंख हवा में तैरते हुये। दिन की तपन बढ़ती ही जा रही है। रेगिस्तान का मौसम जाने किस उदास आदमी ने लिखा था। यहाँ वक़्त की सबसे बड़ी मंडी में खूब तंगी हैं इन दिनों कि तुम्हारी याद के ज़रूरी काम में डूबा हुआ हूँ। 
पानी के मटके से टपकती है बूंद। हर आवाज़ के साथ मेरा दिल डूबता जाता है। समय छीज रहा है। 
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सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.