June 11, 2013

तुमने देखा ही क्या है?

कीमियागरों से कुछ रसायन उधार लेकर, कुदरत का शुक्रिया कहते हुये एक बूढ़ा आदमी बना लेता है ज़िंदगी का आसव, बेहद कड़वा मगर मद से भरा। एक नौजवान लड़का उदास रहता है। सिर्फ इसलिए कि वह मुहब्बत को किसी दरवाज़े की चौखट की तरह खड़ा करना चाहता है। फिर उस तोरण से बार बार अकेला गुज़रना चाहता है। लड़की कहती है तुम खुश रहा करो और फिर सुनती है, लोकगीत से चुराई हुई उदासी से बना सस्ता लोकप्रिय गीत।

मैं न वो लड़का हूँ न उदासी सुनती हुई लड़की। मुझे उस रसायन के बारे में कुछ नहीं मालूम जिसे बूढ़ा आदमी बनाता है। मैंने अपने हिस्से में जो चुना है वह आला दर्ज़े का इंतज़ार है। कि इंतज़ार में समा सकते हैं अनगिनत लड़के, लड़कियां, बूढ़े और हज़ार रकम की चीज़ें। इसमें समा सकती है इस दुनिया जैसी अनेक जगहें जिनके बारे में अभी तुमने सोचा नहीं है। 

इस वक़्त आसमान में बादल हैं। हवा तेज़ है। पर्दे उड़ उड़ कर बालकनी में लगी लोहे की जाली को चूम रहे हैं। ये एक क्षणभंगुर दृश्य है। मैं इसे देखता हूँ और ये मिट जाता है। मुझे अचानक से एक याद आती है। जैसे हवा में कलाबाज़ियाँ खाता हुआ सिक्का होता है। उसका सच और झूठ एक भ्रम में घुला होता है। उसकी चित्त और पट के बीच का फासला वही मंज़र है जो इस वक़्त पर्दे के चूमने और लौट आने के बीच है।
 
एक आवाज़ सुनना चाहता था। एक अभिवादन के प्रत्युत्तर में कोई संकेत देखना चाहता था। अपने दीवानेपन की जद में कोई सहारा चाहता था। बिस्तर पर पेट दर्द से रोये पड़े हुये बच्चे का हाथ थामे हुये वक़्त से कहना चाहता था कि तुम दो फाड़ हो जाओ। एक तरफ अपने बेटे को प्रेम किया जा सके और एक तरफ जिस ज़िंदगी की ठोकरें हैं, उसी को तमीज़ से बोसे दिये जा सकें। 

शामें वैसी नहीं हैं। बीत गयी हैं। मन वैसा नहीं है, उदास कम और उदासीन ज्यादा है। शहर बदलने से कुछ नहीं बदलता। हर आदमी के पास अपनी एक झोली होती है। खुद को दी हुई बददुआओं से भरी हुई। 

पर्दे की तरह उड़ जाते हैं लड़की की देह से कई मौसम। वे उड़ते ही जाते हैं, जैसे मौसमों का छत्ता उसी की नाभि में लगा हुआ है। एक धुंधली तस्वीर बनाता हूँ। गहरे लाल रंग पर इरेज़र से बनाता हूँ कुछ रोशनी और फिर पेंसिल से बना देता हूँ, अफ्रीकी आदिम लोगों द्वारा बनाया जाने वाला सूरज का निशान। ऐसा निशान जो अपने आस पास कई सारे नन्हें सूरज गोल घेरे में लेकर उगता है। किसी के ख्वाब में उग सकने वाली श्याम स्त्री से अधिक काला और उसकी चाहना के उजले रंग से अधिक गोरा। 

वो एक लम्हा था। मैंने लिखने के हुनर से उसका स्केच बना लिया है। तुमको देखा ही नहीं है। हाथ की कलाई में घड़ी बांधना भूल गया हूँ। इस वक़्त की नब्ज़ को इगनोर करके चलता हूँ। सिक्स्थ सेंस के बारे में सुना है? वही सेंस जब कोई कहता है कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और हमें लग रहा होता है कि ये इस वक़्त कोई और बात भी सोच रहा है। उसी सेंस ने मुझसे कहा है कि शराब पिया करो। अच्छे, बुरे, भले, कमीने, सुंदर, अमूर्त, कोमल, कठोर, गहरे और छिछले सब पल नाशवान हैं। 

आई लव यू। 

हाँ हवा अब भी चल रही है। पर्दे फिर से उड़ जाना चाहते हैं। तुमने उनको देखे नहीं न? तुमने देखा ही क्या है? अपने पाँवों को ज़रा सूंघ कर देखो कि उनमें मेरी खुशबू बसी है। तुम्हारी ठोकरे बेकार नहीं गयी हैं। तुम्हारे मन ने सुख और पाँवों ने मेरी खुशबू पायी है। वह बूढ़ा आदमी था नहीं बल्कि मैं होना चाहता हूँ। 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.