June 24, 2013

तस्वीर अधूरी है मगर मिटी तो नहीं है


मेरे पास तुम्हें देने के लिए बहुत सारे प्रेम के सिवा ये कुछ ऊटपटाँग शब्दों के बेसलीका सिलसिले भर हैं।

तूने रुख फेर कर
रख ली है कूची जेब में
तस्वीर अधूरी है मगर मिटी तो नहीं है।
* * *

कुछ नहीं
बस चार बूंदें गिर रही हैं आसमान से।

मैं तोड़ रहा हूँ इनको
अनेक बूंदों में, अपनी बुरी नज़र लगा कर।

तुम्हारे लिए
हज़ार बार बुरा बन जाऊँ तो भी क्या बुरा है?
* * *

एक दरीचा है
एक दीवार का साया है
जैसे कोई पहरा हो, जैसे कोई बंदिश है।

कोई झाँक नहीं है, कोई आवाज़ नहीं है।

बस एक नाम है
और सुना है कि ज़िंदगी है बरसों लंबी।

अगर सचमुच बरसों चल सके ये ज़िंदगी
तो तुम ज़रूर आना कि इंतज़ार बना रहेगा।
* * *

मैं एक कागज से
काटता हूँ बोतल का गला
और उसे बना लेता हूँ काँच का प्याला।

एक दीवार को करता हूँ बाहों में क़ैद
उसकी पीठ पर लिखता हूँ बेवफाई
और कहता हूँ उसे कि लिखा है, प्रेम।

परछाई के आंसुओं को मिलाता हूँ
गाढ़े होते खून में
जो रिस रहा है मेरे होने की खुशी में
और भर लेता हूँ प्याला गहरे लाल रंग से।

अपनी जेब से निकालता हूँ सिक्का
और उसे बारूद बना कर उड़ा देता हूँ ग्लास का पेंदा।

फिर
ज़मीन पर रगड़ कर पेंसिल की नोक
एक ब्लेक होल बना कर कूद जाता हूँ उसमें।
* * *

बारिश की चार बूंदें, हवा के चंद झौंके
ज़मीं पर पाँवों की दस्तक है तो सही मगर फ़ानी।

लंबी चौड़ी सड़कें, इमारतों की छतें
हवाई जहाजों की आवाज़ें,
आदम के दिमाग ने तामीर की थी,
ये फैल गयी है पूरी दुनिया में।

दिल ने जो एक तस्वीर बनाई थी
वह उड़ गयी उत्तरी ध्रुव से भी आगे।

सीने में दर्द है
और झूठ ये कहते हैं खुद से कि संभल जाएंगे।
मगर तुझको अभी ये इल्म नहीं है कि सचमुच ही मर जाएंगे।
* * *

बदन पे जो खरोंचों के निशान हैं
बचपन के खेलों में बेखयाली के हैं
बाकी सब बचते बचाते, समझदार होने के दिनों में लग गए।

माथे पे जो शिकन की जो लकीरें हैं
कुछ दुनिया के साथ जीने की आफत की है
बाकी कुछ न कहे जा सकने वाले फ़सानों की लहरों की वजह से हैं।

ये जो चेहरे पर एक उदासी है
कुछ तो मौसम के असर में है
बाकी कुछ जो सोचा-चाहा उसकी गैरहाजिरी का नक्शा है।

एक रूह रूह नाम तुम रटा करते थे
जिसे मैंने न देखा न जाना
बाकी के सारे दर्द उसी के नाम कर दिये हैं, तुम्हारी बदौलत।
* * *

सूखी दरारों में रेंगता हुआ वक़्त
और खिड़की के शीशे पर ठहरा हुआ धुआँ।

बस एक विस्की का प्याला है, ज़िंदगी में सीलन भरने के लिए।
* * *

उतरती हुई धूप में
एक साया झिलमिलाता है
तुमसे लंबी तस्वीर बनती है मुझसे आगे।

मुड़ कर देखने में अब लगता है डर
हर बार उदासी का सदमा खाकर बुझ जाता है दिल।

मैं इसी छाया तस्वीर में
चुनता हूँ तुम्हारा बायाँ हाथ और थाम लेता हूँ
कुछ दूर ऐसे ही सही मगर चल सकूँ साथ तुम्हारे।

इस तस्वीर में नहीं मिलते तुम्हारे कान
जिनमें कह सकूँ, आहिस्ता
जाना ! रहा करो मेरे पास, तुम्हारे बिना दुनिया उदास है।

एक चिड़िया
मगर खोज लेती है जाने क्या
कि मेरे सर के पास से गुज़रती हुई,
अकेली ही गाती है, कोई दोगाना।

जैसे मैं अकेला ही चल रहा होता हूँ दो लोगों की तरह।
* * *


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एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.