April 26, 2016

इसलिए ऐसे ही



ढलते हुए दिन की किनारी पर
चलते हुए मुसाफ़िर के
रुखसारों को चूमकर
आहिस्ता से हवा ठहर जाती है।

सुबह सीली थी
दोपहर गरम ठहरी
शाम के बीतने के बाद
रात के पहले पहर
कोई सूखी पत्ती
ज़मीं पर बिखर जाती है।

याद ही याद है
कोई हल भी नहीं.

सवालों पे लगे पैबंदों की उधड़ी सिलाई से
झांक एक दूर बीते दिनों तक.

जब से देखा था उसे, जब से उसे खोया है
जब से भूले थे उसे जब से यादों में बसाया है.

कुछ नहीं कर रहा। बस ऐसे ही बैठा हूँ। कोई वजह नहीं सो जाने की। कोई मौका नहीं है जागने का। प्याला भी रखा है और सुराही भी है। नमक लगे कुछ दाने भी रखे हैं। मगर क्यों?

इसलिए ऐसे ही बैठा हूँ।

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.