April 9, 2016

ख़ुद को क्या कहूँ



कभी-कभी आप ऐसी तन्हाई में जीते हैं, जो बेहद तकलीफदेह होती है.

इसलिए कि जिस पर भरोसा करना चाहते है. जिसकी बात का एतबार करना सीखते हैं. उसी की आत्मा में वे लोग बसे होते हैं, जिनसे आपको बेदिली है. आप उसे देखते हैं लगातार उन्हीं का फेरा देते हुए.

आप बार-बार उदास हो सकते हैं. रो सकते हैं, खुद को कोस सकते हैं, चुप हो सकते हैं. आप कुछ भी कर सकते हैं. मगर आखिर में आप वही करते हैं, जो अब तक करते आये हैं. आप सर झुकाए बैठे, उसकी बातों में हामी भर रहे होते हैं.


मैं कई बार सोचता हूँ कि ऐसे लोगों को क्या कहूँ, फिर सोचता हूँ ख़ुद को क्या कहूँ.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.