February 7, 2017

कब तक बचोगे?

बौद्ध मठों की घंटी
मोर का एक पंख
बुद्ध की स्फिटिक मूरत.

कितना कुछ तो है, ज़िन्दगी में.

बस वे जो तीन तिल हैं न तुम्हारी गर्दन के नीचे
उनमें से दो गायब हैं.
* * *

प्रेतबाधा के बारे में ये भी कहा जाता है कि वह दिवस अथवा रात्रि के एक निश्चित समय पर उपस्थित होती है. मेरे साथ भी कुछ रोज़ से ऐसा होने लगा है कि बारह बजते ही दफ्तर में बेचैन होने लगता हूँ. मेरे पांवों से पहले मन घर की ओर भागने लगता है. फिर मैं भी खिंचा हुआ चला आता हूँ. एक बजते ही बैडरूम में चला आता हूँ. मैं तेज़ी से कपड़े बदलता हूँ. अलमारी के हेंगर में टांगने की जगह दरवाज़ा टेबल जो भी दिखा वहीँ कपडे जमा. फिर अगले दस पंद्रह मिनट में नींद. चार पांच या छ बजे तक उठता हूँ. तब तक प्रेत बाधा जा चुकी होती है. 

आज मैंने खींच तान कर इस समय को आगे सरकाया है. अभी तक जाग रहा हूँ. वैसे दिल कहता है सो जाओ, आखिर बुढापे से कब तक बचोगे?
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.