October 28, 2017

क्या होगा सोचकर

उसकी आँखें, रेत में हुकिए का बनाया कुआं थी. मैं किसी चींटी की तरह उसे खोजता रहता था. प्रेम पूर्वक उस भुरभरी रेत पर फिसल जाना चाहता था. उसके दांतों से मुक्ति मेरी एक कामना थी.

उसके होंठ बंद रहते थे, मैं देर तक चुप उनको देखता था. कि हंसी की उफनती लहर आएगी और मैं एक पतली नौका की तरह उसमें खो जाऊँगा. मगर जिस रोज़ मैंने जाना कि वह किसी के प्रेम है. उसी रोज़ मैं रेगिस्तान की रेत के नीचे छुप गया.

यहाँ रेत के नीचे सीलन है, अँधेरा है पर यहाँ भी कभी-कभी उसकी आँखें याद आती हैं, यहाँ भी उसके बंद होठ दीखते हैं.


इसके आगे मैं नहीं सोचता हूँ. क्या होगा सोचकर...

[हुकिया समझते हैं? आंटलायन]



सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.