November 4, 2017

हम फिर मिलते हैं

वो लम्हा पीछे छूट जाता है। सदा के लिए। एक स्मृति भर रह जाता है। हम जब कभी फिर से मिलते हैं तब हम वो नहीं होते, जो पिछली बार थे। अगर हम वही पिछले वाले होते तो हमारा मिलना असम्भव था। एक बीत चुकी मुलाक़ात दोबारा नहीं हो सकती। नई मुलाक़ात को ताबीर करने के लिए सबकुछ नया बनाना पड़ता है।

हम शायद फिर मिलेंगे लेकिन तुमसे कोई और मिलेगा, मैं किसी और से मिल रहा होऊंगा। मगर इस नएपन के बीज हैं, वे शायद कभी न बदलें। परसों सुबह ब्रेख्त की एक कविता पढ़ रहा था। मुझे लगा कि कई बार तुमसे मिलना चाहिए.

मैं तुम्हारे कॉलेज के दरवाजे के सामने की सड़क के पार बस स्टॉप पर बैठा हुआ देख सकता हूँ। तुम मुझे न देखोगी। मैं एक जाती हुई पीठ पर छितराये खुले बालों से मिल लूंगा। तुम मेट्रो स्टेशन पर आ रही होओगी। मैं इस बार फिर अपनी नज़र फेर लूंगा शायद कि मुझे यकीन न आएगा। तुम इतनी सुंदर कैसे हो जाती हो हर बार। मैं तुम्हारे दफ़्तर को जाती सीढ़ियों पर सामने से आता हुआ टकरा जाना चाहूँगा। ये मगर सम्भव न होगा कि उस वक़्त सब दफ़्तर जा रहे होंगे, दफ़्तर से आ कौन सकता है। इसलिए लन्च में दफ़्तर के निचले तल के पिछवाड़े में केंटीन से राजमा-चावल लिए तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।

हम मिले तो चौंक कर मुस्कुरायेंगे। जैसे अब क्या करें?
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कहीं बहुत दूर से डूबे स्वर सुनाई देते हैं। उन पर ठिठका और ध्यानमग्न हुआ मन, अचानक सुनना स्थगित कर देता है। पूर्णमासी का प्रकाश चीजों को आलोकित करता है किन्तु स्याही के बूटे खिले रहते हैं। धुंधले अनचीन्हे स्वर सुघड़ होने लगते हैं। क्या कोई मुझे ही पुकार रहा है?

मैं देखता हूँ कि चांद ने कोई जादू फूंका है और असर बाकी है।
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छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.