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खुली जो आँख तो...

आरज़ुएँ हज़ार रखते हैं...

प्यास भड़की है सरे शाम...

खुशबू उसका पता है...

अमूर्त यादों से खिला रेत का समंदर

आगाज़ हुआ फ़िर किसी फ़साने का...

दोपहर के वक़्त का टुकड़ा...

ख़ूबसूरती का ख़याल और बेसलीका बातें

सलेटी रंग पर कढ़ाई

क्या बुझेगा राह से या सफ़र बुझ जायेगा

प्रेम का कोई तुक नहीं होता