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दोपहर के वक़्त का टुकड़ा...

ख़ूबसूरती का ख़याल और बेसलीका बातें

सलेटी रंग पर कढ़ाई

क्या बुझेगा राह से या सफ़र बुझ जायेगा

प्रेम का कोई तुक नहीं होता

आग के पायदानों पर बैठी स्वर्ण भस्म

औरत की जगह

तेरी ही तरह सोचता हूँ कि गुमख़याल हूँ.

वह एक भयंकर ईश्वर था.

टिमटिमाती हुई रोशनियों में

तेरे खाके भी मेरे पास नहीं रह सकते...