September 5, 2011

मरक़दों पे तो चिरागां है शब-ओ-रोज़

मैं एक अजनबी की तरह पार्क में दाखिल हुआ.
वहां कुछ जगहों पर दूब नहीं थी और खास तौर से जिस जगह पर कसरत करने के लिए दो 'बार' लगी थी वहां बिलकुल भी नहीं थी. उस नौजवान आदमी ने बार पर टिकी हुई हथेलियों पर अपने शरीर को सीधा उठाये हुए मेरी तरफ देखा. जबकि उसकी पीठ मेरी ओर थी. उस आदमी की उम्र कोई पच्चीस साल रही होंगी. इसके बाद मैंने एक नन्हे बच्चे को देखा जो ज़मीन और बार के बीच जाने किस चीज़ पर बैठा था. वह बच्चा चूँकि बैठा हुआ था इसलिए उसके कद और उम्र के बारे में कुछ कहना मुश्किल होगा किन्तु वह चार साल की उम्र से छोटा ही रहा होगा. उसके पास एक लड़की खड़ी थी. इन तीनों को एक साथ देखने से लगा कि वह निश्चित ही एक परिवार है. अर्थात पति, पत्नी और उनका बेटा.

सूखी हुई घास की तरफ बढ़ते समय मेरी चाल निरुद्देश्य सी दिखती होगी लेकिन जल्द ही उन सब के पास पहुँच गया. जैसे अभी अभी बिना मकसद के चल रहा था और अभी अभी लगता है कि किसी ख़ास काम के सिलसिले में इन्हीं से मिलने आया हूँ. वह लड़की निरंतर मेरी ओर देख रही है, ऐसा मुझे लगता है. इसलिए कि मैं निरंतर उस नौजवान को देख रहा हूँ. जो वर्जिश में लगा है.

"हाँ मुझे बताया." ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने किसी का नाम नहीं लिया, ना ही किसी ओर देखा. मगर मुझे लगा कि वह पास खड़ी युवती के बारे में कह रहा था. जो अब बिना किसी संशय के उसकी पत्नी समझ आने लगी. इस बागीचे से मेरा घर साफ़ दीखता है. मैं यहाँ बहुत कम आता हूँ. उसने थोड़ी देर में कहा. "आपके लिए जरुर करेंगे." मैं उसको धन्यवाद तक नहीं कह पाया.

मैंने करवट ली होगी, शायद करवट... कि जगह बदल गयी.
अब एक उंची आलीशान बिल्डिंग के आगे की चौड़ी सड़क थी. बिल्डिंग ऐसी कि किसी महानगर के संभ्रांत रिहायशी इलाके में खड़े शोपिंग मॉल सरीखी. उसके आगे की चौड़ी सड़क के पार एक पतली गली में घरों की कतार है. उनके आगे से गुज़रते हुए एक दोमंजिला मकान को मुड कर देखता हूँ. मकान के पास खाली छूटी हुई ज़मीन है. इस पर एक घर बनाया जाना अभी बाकी है. मकान वाली पंक्ति के सामने के घर के आगे लगे पेड़ के पास वही नौजवान बैठा है और लड़की खड़ी है.

अगले पल लड़की उस दोमंजिला घर के अन्दर दिखाई देती है जबकि नौजवान जा चुका होता है. शायद फ़िर करवट ली.

खुले मैदान जैसी जगह है. जो व्यस्त शहर के उसी मॉल की ओर जाती है. भारी भरकम सामान ढ़ोने वाला एक विशालकाय वाहन अचानक मुझे अपने सर के ऊपर दिखाई देता है. इसमें स्टील के चद्दर है. जो किसी झाड़ू की तरह रगड़ खाते हुए पीछे आ रहे हैं. मैं उनके बीच ख़ुद को इस तरह पाता हूँ जैसे किसी विशाल स्तम्भों पर खड़ी छत के नीचे हूँ. मैं अपनी ओर बढ़ते आते चद्दरों से कट जाने से बचने के लिए आखिरी प्रयास करता हूँ.

मैं चूमने जितने फासले से बाहर आ जाता हूँ. अब रौशनी है. एक रुकी हुई साँस है. मैं अपने पांवों पर खड़ा हूँ. वहां एक सड़क बन रही है...

कल रात की नींद में सपनों के सिनेमाघर की ये तीसरी फ़िल्म थी. इससे पहले की दो फ़िल्में मैंने जानबूझ कर याद नहीं रखनी चाही कि वे खास उत्साह नहीं जगाती थी. इसमें ऐसा लगता था कि वो लड़की तुम हो !

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.