September 13, 2012

इन्हीं दिनों


इन्हीं दिनों 
मैंने अपने क़बीले के सदर से कहा
कि एक टूटी हुई टांग वाला भेड़िया हो जाना
और फिर घिर जाना तूफ़ान में कैसा होता है?

इन्हीं दिनों
उस बूढ़े आदमी की तवील ख़ामोशी के बीच
दुनिया के किसी कोने में
एक लंबी दाढ़ी वाले आदमी की
खूनसनी वसीयत लिए
कोई हँसना चाहता था क़यामत जैसी हंसी
मगर वह किसी पहाड़ की गुफा से आती
अधमरे लकड़बग्घे की खिसियाई हुई आवाज़ थी।

इन्हीं दिनों
एक बड़े कबीले ने कहा
आओ हम दोनों मिलकर बनाए नए हथियार।
उसी पल सदर ने
ज़िंदगी भर के राज में पहली बार आँख मारी
और अपनी कामयाबी पर खींची एक छोटी मुस्कान की लकीर।

इन्हीं दिनों
कुछ लोग हाथों में लिए हुये त्रिशूल
मार डालना चाहते थे, उस लकड़बग्घे को
ताकि वे हंस सकें उसकी जगह क़यामत की हंसी।

इन्हीं दिनों
मैंने अपना सवाल ले लिया वापस
और कहा कि आपकी टांगों में कमजोरी है
मगर आपसे बेहतर कोई नहीं है।

कि जब मैंने चाहा था
चुरा लूँ हनुमान जी की लाल लंगोट
और उसे बना लूँ परचम
तब मेरे ही कबीले के लोग हो गए थे मेरे खिलाफ़
कि देवताओं के अपमान से
बेहतर है नरक जैसा जीवन जीते जाना।

इन्हीं दिनों
मेरे सदर, ये सच लगता है कि मुझको
कि सब अपनी तक़दीर लिखा कर लाते हैं।

इन्हीं दिनों, मैं शायद सबसे अधिक हताश हूँ।
***
[Image courtsey : indiamike.com]

सर्द रात

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.