September 7, 2012

वे फूल खिले नहीं, उस रुत


मैंने ऊंट से कहा कि रेगिस्तान की धूल का कोई ठिकाना तो होता नहीं फिर किसलिए हम दोनों यहीं पर बैठे हुए अच्छे दिनों का इंतज़ार करें. ऊंट ने कहा कि मैंने कई हज़ार साल जीकर देखा है कि कहीं जाने का फायदा नहीं है. इस बाहर फैले हुए रेगिस्तान से ज्यादा बियाबान हमारे भीतर पसरा हुआ है. देखो यहाँ से उफ़क़ कितना साफ दिखता है. रात में यहाँ से तारे भी कितने ख़ूबसूरत नज़र आते हैं. ऊंट की इन्हीं बातों को सुन कर इस सहरा में रहते हुए मुझे ख़ुशी थी कि सुकून के इस कारोबार पर शोर की कोई आफ़त नहीं गिरती. 

हम दोनों ने मिल कर एक पेड़ के उत्तर दिशा में घास फूस से छोटी झोंपड़ी बनाई.

ऊंट मुझे कोई छः महीने पहले एक कुंए के पास प्यासा बैठा मिला था. इससे पहले वह किसके साथ था? ये मुझे मालूम नहीं मगर ये उसी शाम की बात है. जिस सुबह दिन के उजाले में कौंध गई एक रौशनी से डर कर रेगिस्तान के इस कोने में छुप गया था. हम दोनों दिन में एक बार रोहिड़ा के पेड़ का चक्कर काट कर आते थे. मैंने ऊंट से कहा था कि जिस दिन इस पर गहरे लाल रंग के फूल खिल आयेंगे, हम दोनों पूरब की ओर चल देंगे.

फूल मगर इस रुत नहीं आये. 
ऊंट ने अपने गद्दीदार पैरों की तरफ देखा और कहा. मैं तुम्हारी तरह मोहब्बतों की गरज नहीं करता हूँ. रास्तों की मुझे परवाह नहीं है. मैं ऊँचे कांटेदार दरख्तों की पत्तियां चुनता हुआ अकेला फिर सकता हूँ. मैंने शर्म से अपना सर झुका लिया कि मेरे पास तुम्हारी याद में उदास रहने के सिवा कोई काम न था. मुझसे ऊंट अच्छा था इसलिए मैंने रेत पर लिखा कि काले रंग के घने बादलों में छुपी होती है श्वेत चमकीली कड़क से भरी रौशनी की तलवार, तुम्हारे पास एक धड़कता हुआ दिल है मगर तुमने ज़ुबां कहां छुपा रखी है. 

इसे पढ़ कर ऊंट ने अपनी गरदन झोंपड़ी से बाहर निकाल ली और देर तक रेत पर उल्टा पड़ा हुआ लोट पोट होता रहा. उसने मुझे अपने पीले गंदे और लम्बे दांत दिखाए. उस दिन मैंने ऊंट से कुट्टी कर ली. हम दोनों साथ साथ रहते थे मगर कभी बोलते न थे. एक धूसर रंग की पीली चोंच वाली चिड़िया, हम दोनों के हिस्से के गीत गाकर चली जाया करती थी. मेरी नक़ल करता हुआ, ऊंट साल भर चुप बैठा रहा. छोटे छोटे दिनों के आने तक भी रोहिड़े पर फूल नहीं आये. एक रात गहरी ठण्ड पड़ी. सुबह ऊंट अपने गलफड़ों से बिलबिलाने की आवाज़ निकालता हुआ देखता रहा इधर उधर... उसने मुझे देखा तो शर्म से आँखें फेर ली. मैंने मगर नहीं पुकारा तुम्हारा नाम. 

फूल भी कहां खिले थे इस साल.
***

[Painting Image Courtsey : Andrew Dean Hyder]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.