May 12, 2013

परछाई की गंध

आँधी का झौंका
उड़ा देता है, रेत की कच्ची परत
आधी रात को चिंगारी जागती है लंबे अवकाश से।

दो बूंदें भिगो देती है 
स्याही पर चमकती आग की रूह को
रेगिस्तान फिर सो जाता है पिछली रात के ख्वाब में।

मद्धम हवा पुकारती है एक विस्मृत नाम
और फिर रात के लंबे घने बालों में ओढ़ लेती है चुप्पी।

अलसाई गठरी से चुन कर
याद का रेशमी धागा
चिड़िया अपने घोंसले में लिखती है बीते दिनों की परछाई की गंध।

वक़्त की राख़ को पौंछ कर
आसमान में चाँद सजा लेता है एक सितारा अपनी दायीं तरफ।

तुम भी देखो, मैं ज़िंदा हूँ इन सबमें थोड़ा थोड़ा।
* * *


[Painting Image Courtesy - Joan Miro]


सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.