May 28, 2013

एक कमीज, मेड इन बांग्लादेश

इस कमीज की कोहनियों पर लगा हुआ है, काले रंग का एक क्रॉल पैबंद। इस उम्मीद में कि शायद आने वाले दुख के दिनों में ये पैबंद कुछ ज़ख़्मों से बचा ले। ज़िंदगी अपने प्यारे बच्चों के लिए बेहिसाब चिंता करती है। जब ये पहले से ही तय होता है कि गले लगना है और बिछड़ जाना है। एक कंटीली बाड़ के नीचे से बनाना सुराख और किसी नौसिखिये रंगरूट की तरह कोहनियों के बल चलते हुये नापना है मुहब्बत का रास्ता। 

उन दिनों के लिए इसकी कोहनियों पर लगा हुआ है, काले रंग का कपड़ा। 

मैं कभी कभी शाम होते ही अपने वार्डरोब के पास खड़ा होकर कहता हूँ। मेरे प्यारे दोस्त कोई क्या देना चाहता है इससे इतर ज़रूरी ये है कि तुम अपने लिए क्या चुनोगे? मैं तिरस्कार और ज़लालत से हट कर चुन लेता हूँ उस कमीज की खुशबू हालांकि उसमें किसी बांग्लादेश के गरीब कारीगर के हाथों और अगर किसी औरत ने टांके हों बटन तो दो लोगों की मिली जुली खुशबू होगी। कारीगरों को कहाँ मालूम होगा कि इस कमीज की आस्तीनों के फ़ोल्ड में किस जगह की फाइन डस्ट भरी होगी। उनको ये भी नहीं मालूम होगा कि कोई इसे पहनेगा या ये यूं ही टंगा रहेगा, अजीर्ण स्मृति की तरह।

एक कमीज है 
मेड इन बांग्लादेश।  

मैं अपने दिल की इत्रदानी में तुम्हारी खुशबू रखता हूँ। इस पर किसी देश की जगह तुम्हारी रूह का टैग लगा हुआ है। सुबह की तीसरी चाय का प्याला लेपटोप से गिरते गिरते बचा है, कई बार। मेरी अंगुलियाँ जाने कौनसे अक्षर खोज रही है, तुम्हारे लिए। 
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मैं तक़दीर को सूंघ रहा हूँ, जासूस कुत्ते की तरह। मुझे वहम है कि उसके हिसाब में कुछ और दिल में कुछ और रखा है। इसलिए तक़दीर का रोना मुल्तवी है। ज़िंदगी के इंतज़ार के लिए ज़िंदगी की इज़ाजत की ज़रूरत नहीं है। 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.