August 10, 2020

ठहरी हुई सतर

जीवन भीतर से तरंगित होता है। कभी-कभी उसकी आवृति इतनी क्षीण होती है कि सुनने के लिए ध्यान लगाना पड़ता है। सुस्त बाज़ार में खाली पड़ी नाई की दुकान, किराणे की पेढ़ी के आगे सूनापन और चाय की थड़ी की बैंचों पर पसरी चुप्पी दिखाई देती है।

असल में जीवन का बाजा तब भी बज रहा होता है। सूनी बैंचों पर बैठे हुए, दुकानों के आगे बने ओटों पर ज़र्दे को थपकी देते और बीड़ी सुलगाते लोगों की स्मृति ठीक से बुझ नहीं पाती उससे पहले दृश्य में नए चेहरे समा जाते हैं।
एक ठहरी हुई सतर पर कुछ नए लफ्ज़ गिरते हैं और वह आगे बढ़ जाती है।
मैं ऐसे दृश्यों को शब्दों में बांध लेना चाहता हूँ। दीवार पर अशुद्ध वर्तनी में लिखे अनुरोध पढ़ते हुए देखना चाहता हूँ कि पिछली बरसात से अब तक दीवार पर स्याह रंग कितना बढ़ गया है।
सड़क पर उड़ते कागज़ के कप, बुझी हुई बीड़ियाँ, सिगरेट के टोटे और पान मसालों की पन्नियां समय के निशान हैं। संझा होते ही इनको बुहार दिया जाता है तब लगता है जैसे किसी गहरी झपकी से जाग गया हूँ। खुद को देखता हूँ कि मैं बिल्कुल नया हूँ।
मैं जो वहीं बैठा था। समय जो निरन्तर बीत रहा था। जीवन जो अपनी उम्र में एक टिक आगे बढ़ गया था।
कुछ भी ठहरा हुआ नहीं होता। न सुख न दुख।
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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.