September 5, 2010

हम तुम... नहीं सिर्फ तुम

अभी बहुत आनंद आ रहा है. रात के ठीक नौ बज कर बीस मिनट हुए हैं और मेरा दिल कहता है कुछ लिखा जाये. खुश इसलिए हूँ कि चार दिन के बुखार के बाद आज सुबह बीवी की डांट से बच गया कि मैंने दिन में अपने ब्लॉग का टेम्पलेट लगभग अपनी पसंद से बदल लिया कि एक दोस्त ने पूछा तबियत कैसी है कि अभी आर सी की नई बोतल निकाल ली है... हाय पांच सात दिन बाद दो पैग मिले तो कितना अच्छा लगता है.

सुबह ख़राब हो गई थी. मेरे समाचार पत्र ने अपने परिशिष्ट का रंग रूप तो बदला मगर आदतें नहीं बदली. यानि वही सांप वाली फितरत कि मध्य प्रदेश में व्यापार करने और अख़बार के पांव जमाने को भारतीय जनता पार्टी को गाली दो लेकिन हिंदुस्तान की खुशनुमा फेमिली के तौर पर भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन और उसकी पत्नी का इंटरव्यू छापो. चाचा, कृष्ण के वैज्ञानिक तत्व पर शोध की पोल यहीं खुल जाती है. तुमसे तो कुलिश साहब अच्छे थे कि जो करते थे, वही कहते भी थे. तुम मीर तकी मीर से शाहिद मीर तक को भुला देना चाहते हो और संगीत में अन्नू मलिक को हिंदुस्तान का सिरमौर मनवाना चाहते हो, कि तुम्हें सब भूल जाता है और एक आमिर खान का लास्ट पेज पर पांच सेंटी मीटर का स्टीमर लगाना याद रहता है... और तो कुछ बचा नहीं है उस कौम में जो हिंदुस्तान की होकर भी हिंदुस्तान की नहीं कहलाती.

आज दिन भर मेरे ज़ेहन में बहुत से नाम आते रहे और मैं सोचता रहा कि क्या वाकई उनको प्रकाशन उद्योग मिटा पायेगा, क्या व्यापार इंसान से बड़ा हो जायेगा और क्या महमूद दरवेश का नाम भी फिलिस्तीन के मिट जाने पर मिट जायेगा. उधर चार दिन पहले फ़िडेल कास्त्रो फिर दिखाई दिये थे उन्होंने बोला भी कि दुनिया में जब कुछ न बचेगा तब मज़लूम बचेंगे. मुझे उनको देख कर ख़ुशी होती है कि उनका देश रहमो करम पर नहीं चलता. हम दिल से भूल जाते हैं भोपाल गैस काण्ड के सबक को और नए परमाणु समझौते को सदन में पारित करवा लेते हैं. हम भूल जाते हैं उन लोगों को जो तीन सौ इकहत्तर को समाप्त करने का एजेंडा लेकर आते हैं और राज कर के चलते बनते हैं.

'हम तुम' नहीं सिर्फ तुम...

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छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.