May 29, 2012

कौन गुज़रा था अभी..



रात के बेहूदा ख्वाबों से बच कर सुबह आँख खुलने के बाद जी कहीं लगता ही नहीं. देखता हूँ कि ड्राफ्ट में बहुत सारे शब्दों का जमावड़ा हो गया है. कुछ भी तरतीब से नहीं, सब कुछ बेकार. हर बार यही सोच कर उठ जाता हूँ कि इसे डिस्कार्ड कर दिया जाये. कई बार हम खुद से कनेक्ट नहीं हो पाते हैं. अपना ही लिखा हुआ बेमानी लगता है. आखिर खुद को याद दिलाता हूँ कि ये मेरी अपनी ही डायरी है. इसमें दर्ज़ किया जा सकता है बेकार की बातों को भी... 

हम कितनी ही बार कर देते हैं
खुद की हत्या
और वह आत्महत्या नहीं कहलाती.
* * *

हम देखते हैं बालकनी में आकर
कि कौन गुज़रा था अभी गली से.

गली, जो सूनी है, बरसों से.
* * *

एक बच्चा सलेट पर लिखे हुए को मिटा कर 
फिर से शुरू करता है लिखना.

लोग आते जाते रहते हैं,चलती रहती है जिंदगी.
* * *

खबर थी मुझको
कि इस दौर में प्रचलित चीज़ है, धोखा
मगर यह पक्की खबर न निकली.

कि नायकों ने चुन लिया था
कुछ अजनबी औरतों को ख़ुद के लिए
और वे कभी साबित न हो सकी अजनबी.
* * *

दुनिया भर के भरम चुनते हुए
हमें लौट आना चाहिए हमारे खुद के पास.
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.