जहां पिछले बरस

वो साल भर पहले का ठीक यही दिन था। सुस्त क़दम चलते। प्लेटफॉर्म पर अनमने खड़े। रेल गाड़ी का इंतज़ार करते हुए। अजनबियों से उचटी हुई नज़र अतीत में कहीं झांक रही थी। आज वहीं हूँ। सोचता हूँ कि जीवन कितने अचरजों से भरा है। पिछले बरस इसी समय, इसी प्लेटफार्म पर था। उसी रेलगाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था, जिसमें आज जाना है। उसी जगह, जहां पिछले बरस गया था।

लेकिन जीवन जो था, अब बहुत बदल गया है। मैं अपने होठों पर मद्धम मुस्कान देखता हूँ। इतनी सी कि जिसे केवल मैं देख सकूँ। शुक्रिया कहता हूँ।

अकसर अनजाने हम ग़लत फैसले करते हैं। इसमें कुछ ग़लत नहीं है। ऐसा होता रहता है लेकिन जब हम ये जान लें। उसके बाद भी वहीं बने रहें। हालात को कोसें। किस्मत जैसी किसी सुनी-सुनाई चीज़ को दोष दें। ये ग़लत है।

उस रोज़ थकान थी। कैसलापन था। ऊब थी। घृणा थी। आज कुछ नहीं है। अभी ट्रेन में बैठ जाऊंगा और मेरे पास एक लंबी कहानी है, बीस हज़ार शब्दों की। उसे ठीक करूँगा। कहीं- कहीं गैरज़रूरी ब्यौरे हैं। कहीं कहानी के प्रवाह को तोड़ने वाले वाक्य हैं।

अगर चार्जिंग पॉइंट न मिला तो मेरे पास एक चार सौ पन्नों का उपन्यास भी है। कभी- कभी जब हम बोझ उतार देते हैं तब हमारे पास बहुत कुछ होता है।

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