May 4, 2017

चीज़ों के प्रति क्षोभ

कभी अचानक आवरण के भीतर झांकने की लत लग जाती है. फिर चीज़ों को बिना खोले भीतर से देखने लगते हैं. जैसे कोई चित्रकार पहले स्केलेटन बनाना सीखता है. उसके बाद मांस-मज्जा. फिर वह कटाव बनाता है. फिर एक ऐसी शक्ल सामने आती है, जिससे हमारा रोज़ का वास्ता होता है. हम चित्रकार नहीं होते हैं. इसलिए देखी हुई चीज़ों को जब उलटे क्रम में खोलते हैं. तब ख़ुद को याद दिलाना चाहिए कि ये सीखना नहीं है. ये असल में चीज़ों के प्रति क्षोभ है. ये उनको नकार देने की हद तक जान लेने की चाहना है.

हम तेज़ी से बदलते हैं, हमें इसपर कड़ी नज़र रखनी चाहिए.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.