December 5, 2018

मैं अपनी एक बेहद झूठी तस्वीर हूँ



लगता है ऐसा कभी कभी
जैसे कि शाम ढल गयी।

हर दिन मैं एक नए मन के साथ जागता हूँ। मैं बहुत कुछ भूल चुका होता हूँ। अपनी ही लिखावट को पढ़कर याद नहीं कर पाता कि ये किसके लिए लिखा था। मेरी लिखावट में किसी का नाम नहीं होता। इससे भी अधिक मुश्किल की बात ये है कि अक्सर लिखावट में किरदार इतने गहरे और सुंदर लिखता हूँ जितना मैंने उनको सुंदर होना चाहा था। ऐसे किरदार दोबारा सच में कभी खोजे नहीं जा सकते।

तस्वीरें इसके उलट एक खाका अपने साथ लिए बैठी रहती हैं। जैसे अभी-अभी ही उस कॉफी टेबल से उठ कर आया हूँ। लेकिन एक दिक्कत है कि तसवीरों में भी किरदार छुपाए जा सकते हैं। हम बाद अरसे के हमारी मुस्कान और दुख को नए अर्थों में पढ़ पाते हैं।

ये सच है कि लिखावट झूठ से भरी होती है। तस्वीरें झूठी नहीं होती ऐसा नहीं है लेकिन वे इसलिए बच निकलती हैं कि वे कभी कुछ कहती नहीं। केवल देखने वाला ही उनको पढ़ता है।

मैं अपनी एक बेहद झूठी तस्वीर हूँ।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.